तस्वीरों की बात जुदा, उच्च हिमालयी आदमी संकटों से घिरा

किसान की दाल-रोटी छीन कर दलाल कमाते हैं भारी मुनाफा
चन्द्रशेखर जोशी
हल्द्वानी। धरती आंखों को लुभाती है, जिंदगी मन को दुखाती है। एक बार मिलम ग्लेशियर आने वाले इसे जन्नत कहते हैं, पर उच्च हिमालयी आदमी संकटों से घिरा है।
…उत्तराखंड के मल्ला जोहार से आगे मिलम जाने वाला यह रास्ता जानलेवा है। बरसात के मौसम में चायना बार्डर पर रहने वाले 12 गांवों के लोग चार महीनों के लिए घरों में कैद हो जाएंगे। न राशन होगा, न दवा होगी, शेष दुनिया से कोई वास्ता न रहेगा। बादल फटा तो किसी का पता भी न चलेगा। इस साल ग्लेशियरों में रिकार्ड बर्फ गिरी। यहां से निकलने वाले हिमनद उफान पर हैं। शुद्ध पानी की लबालब बिलजू, गोंखा, लास्पा, पांछू नदियां धरती को सीचेंगी, तराई-भावर, मैदान में हर जीव का हलक तर करेंगी।
…तफरीह करने वाले इस धरती को स्विटजरलैंड की संज्ञा न दें, यूरोप का नाम जुबां पर न आने दें। ये कोई परियों की दुनिया भी नहीं। धरती की सुंदरता पर फिदा होने से पहले मानव का जीवन समझें। यहां रहने वाले 30 साल के युवा चेहरे 50 साल से अधिक उम्र की झुर्रियों से भरे हैं। सीढ़ीदार क्यारियों में उगाई सफेद राजमा का स्वाद चखने से पहले गौर करें। उपज इतनी नहीं कि बाजार तक पहुंच सके, इसके बाद भी कुछ रुपयों की खातिर अपना भोजन बेच दिया जाता है। किसान की दाल-रोटी छीन कर दलाल भारी मुनाफा कमाते हैं। गांवों के हालात जानेंगे तो लगेगा राजमा की इस धवल सफेदी में आदमी की हड्डियों का जर्क घुला है।
…लोग बर्फ पिघलते ही जंगलों से कीड़ा जड़ी बीन कर लाते हैं। प्रचुर स्टार्च से भरी यह जड़ी सदियों से भोजन का हिस्सा थी। कुछ सालों पहले इसे दवा कहा गया। असल में इस जड़ी पर जब चायना की नजर पड़ी तो इसे शक्तिवर्द्धक बता कर बाजार में बेचा जाने लगा। इस जड़ी की खूब तस्करी हुई। गांव वालों के हाल वही रहे, तस्कर-दलाल मालामाल हो गए। बाद में चायना ने इसके गुण देखे और लैब में ही कीड़ा जड़ी का उत्पादन शुरू कर दिया। सरकार ने कीड़ा जड़ी बीनने पर प्रतिबंध लगा दिया। जान जोखिम में डालकर ऊंचे पर्वतों से जड़ी बीनने वालों पर पुलिस का पहरा बिछ गया। अगर यह जड़ी शक्ति बढ़ाती तो उच्च शिखरों पर रहने वालों के कदमों तले की पूरी दुनिया इनको न लूट पाती।
…यहां से कुछ सौ किलोमीटर पहले मध्य हिमालयी भू-भाग में इस मौसम में सेब प्रजाति के बहुतेरे फल होते हैं। गहरे पीले आडू-खुमानी, सुर्ख लाल पुलम घूमने वालों को आनंदित कर देते हैं। बाहर से आए लोगों के लिए पेड़ों से फल तोड़ने पर कोई मनाही नहीं। राह चलते लोगों को खट्टे-मीठे रसभरे फल नई ऊर्जा देते हैं। इन फलों को तैयार करने वाले तीन महीने दिनभर चिड़िया भगाते, रात में बंदर और सूअरों का पहरा देते हैं। तैयार होने के बाद फलों का कोई दाम नहीं मिलता, इनको मुफ्त में खाने वाला भी कोई नहीं। गौर से जीवन में झाकेंगे तो समझ आएगा कि इन फलों की तासीर में गांव के जीवन की खटास घुली है, ये रक्त सरीखा रंग आदमी के खून से भरा है।
लेखक चन्द्रशेखर जोशी वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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