इतने सरल कि छात्र को स्वयं लिखकर दिया प्रकाश पंत ने साक्षात्कार

सर्वांंगीण विकास के लिये शिक्षा ग्रहण करने की कही थी बात
कुमाऊं जनसंदेश डेस्क
हल्द्वानी/नैनीताल। प्रदेश के दिवंगत हो चुके प्रकाश पंत की सादगी की चर्चा,ं इन दिनों हर जुंबा पर हैं। इसी तरह की सादगी का एक और उदाहरण देखने को मिला। आम तौर पर थोड़ा ऊंचा पद या शोहरत मिलने पर राजनेता या कोई भी व्यक्ति इतराने लगता है। मगर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री का पद होने के बाद भी स्व. पंत के स्वभाव और व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं देखने को मिला। यही वजह रही कि पार्वती प्रेमा जगाती सरस्वती विहार नैनीताल में पढने वाले कक्षा आठवीं के छात्र दीप चंद्र जोशी ने जून 2017 में सोशल साइंस में किसी सफल राजनेता के साक्षात्कार का विषय मिलने पर जब उन्होंने स्व. प्रकाश पंत को लिखित सवाल दिये तो पंत ने भी छात्र को पूरा वक्त देते हुण् स्वयं लिखकर उसके सवालों का जवाब दिया। यह उनकी सादगी का नायाब नमूना है। छात्र के सवालों का जो लिखित जवाब 12 जून 2017 को स्व. प्रकाश पंत ने दिया उसे स्कूल के शिक्षक घनश्याम ढोलगांई ने उपलब्ध कराया है। साक्षात्कार में छात्र ने उनसे पूछा था कि उनकी प्रारंभिक शिक्षा कहां से हुई और उनका जन्मस्थल कहां है तो उन्होंने प्रश्न के उत्तर में कहा था कि 11 नवम्बर 1960 को उनका जन्म लखीमपुर में हुआ। प्राथमिक शिक्षा चंपावत में हुई। माध्यमिक शिक्षा पिथौरागढ़ व प्राविधिक शिक्षा पालीटैक्निक द्वाराहाट में प्राप्त की। स्व. पंत ने यह भी बताया कि उन्होंने दूरस्थ शिक्षा एमबीए भी किया है और कुविवि से एलएलबी भी कर रहे हैं। अभी उनके दो सेमेस्टर शेष बचे हैं। छात्र द्वारा उनसे यह भी पूछा गया कि उनका राजनीति में आने का मन कैसा बना पंत ने बताया कि 1977 में छात्र राजनीति में थे। प्रथम बार पिथौरागढ़ में सैन्य विज्ञान परिषद का महासचिव बने, 1981 में राजकीय कर्मचारी के रूप में फार्मासिस्ट एसोसिएशन तथा संयुक्त कर्मचारी परिषद में पदाधिकारी रहे। उसके बाद सरकारी सेवा सक्रिय राजनीति में बाधक बनी तो उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ दी। 1984 में भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली। छात्र ने जब उनसे जीवन में विशेष घटना के बावत पूछा तो उन्होंने कहा कि 2000 में राज्य निर्माण हो चुका था। विधान परिषद के रूप में उत्तराखंड की विधानसभा में नामित हो चुका था। मंत्री मंडल के विस्तार में नाम नहीं था। परंतु विधान सभा अध्यक्ष का निर्वाचन होना था, जिसके लिये नाम का विवाद चल रहा था तो वह अनवरत क्षेत्र भ्रमण पर चले गये। अध्यक्ष विधानसभा के निर्वाचन की तिथि 12 जनवरी 2001 घोषित हुई। जब क्षेत्र से वापस आये तो तत्कालीन मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी ने बुलाया और कहा कि आपने विधानसभा अध्यक्ष पद के लिये नामांकन करना है। यह घटना उनके लिये अप्रत्याशित थी क्योंकि मुझसे अधिक अनुभवी विधायक संदन में थे। अचानक प्रस्तुत प्रस्ताव मुझसे भूला नहीं भूलता। पंत से उनके आगे के लक्ष्य के बावत पूछे गये प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि अंतिम छोर में बैठे हुये व्यक्ति तक विकास की धारा को बिना अवरोधों से पहुंचाना उनका लक्ष्य है। बच्चों के लिये उनका संदेश था कि केवल शिक्षा रोजगार प्राप्त करने के लिये नहीं वरन सर्वांंगीण विकास के लिये ग्रहण करनी है। इसके लिये प्रतिदिन कड़ाई से समयबद्धता का पालन करना, शिक्षा ग्रहण करने में एएकाग्रता, शिक्षणेत्तर क्रिया कलापों में सक्रिय भागीदारी, जीवन का लक्ष्य बनाकर आज से ही उसे प्राप्त करने का ठोस प्रयत्न, खुली आंखों से बड़े सपने देखना, उन्हें पूर्ण करने लिये मेहनत करना, बच्चों के लिये उनका यही संदेश है। किसी स्कूली बच्चे को दिये गये इस साक्षात्कार के अंतिम प्रश्नों पर उन्होंने बच्चों के लिये जो संदेश दिया है वह काबिले तारीफ ही नहीं बल्कि अनुकरणीय है।

साक्षात्कार के लिखित जवाब
साक्षात्कार के लिखित जवाब
साक्षात्कार के लिखित जवाब

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